मायावती ने राज्यसभा की सदस्यता से दिया इस्तीफा…

ह्सहारनपुर मुद्दे पर बोलने नहीं देेने का लगाया आरोप

नयी दिल्ली, 18 जुलाई। बहुजन समाज पार्टी की अध्यक्ष मायावती ने सरकार पर दलितों की उपेक्षा करने और उन्हें इस संबंध में राज्यसभा में नहीं बोलने देने का आरोप लगाते हुए आज सदन की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया, सुश्री मायावती ने सभापति हामिद अंसारी से संसद भवन में उनके कार्यालय में भेंटकर उन्हें अपने इस्तीफे का तीन पृष्ठ का पत्र सौंपा। इसके बाद सुश्री मायावती ने संसद भवन परिसर में संवाददाताओं से कहा जब सत्ता पक्ष मुझे अपनी बात रखने का भी समय नहीं दे रहा है तो मेरा इस्तीफा देना ही ठीक है। इससे पहले उन्होंने सुबह राज्यसभा में दलितों पर अत्याचार की घटनाओं पर बोलने के लिए पर्याप्त समय नहीं मिलने का आरोप लगाते हुए कहा था कि अगर उन्हें अपनी बात नहीं रखने दी जाती है तो वह सदन से इस्तीफा दे देंगी। इसके बाद वह विरोध स्वरूप रोष में सदन से बाहर चली गयी थी। उन्होंने सदन में नियम 267 के तहत चर्चा शुरु्र करते हुए कहा था कि भारतीय जनता पार्टी के सत्ता में आने के बाद से भीड़ द्वारा हत्याएं किए जाने की घटनाएं बढ़ रही है और अल्पसंख्यकों, पिछड़े, दलितों, किसानों और मजदूरों का दमन किया जा रहा है। भाजपा शासित राज्यों में भीड़ द्वारा हत्या के मामलों में इजाफा हो रहा है। सुश्री मायावती ने इस्तीफे के पत्र में सदन की कार्यवाही का ब्योरा देते हुए कहा कि वह जब स्थगन के नोटिस पर बोलने के लिए उठी तो उप सभापति ने उन्हें तीन मिनट में ही अपनी बात पूरी करने को कहा जबकि उनका कहना था कि तीन मिनट में इस मामले पर पूरी बात नहीं रखी जा सकती। सदन के नियमों में भी ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है कि स्थगन नोटिस पर सिर्फ तीन मिनट का समय मिलेगा। लेकिन फिर भी उन्होंने अपनी बात रखनी शुरू की। जिस पर सत्ता पक्ष के सदस्यों के साथ साथ कुछ मंत्री भी खड़े होकर शोर शराबा करने लगे और लगातार व्यवधान डालते रहे। बसपा प्रमुख ने कहा कि उन्होंने अपनी बात रखते हुए जब यह कहा कि सहारनपुर में दलित उत्पीडन की घटना पर परदा डालने के लिए एक दलित संगठन का भी इस्तेमाल किया गया और उसे जातीय हिंसा का नाम दे दिया गया तो सत्ता पक्ष के सदस्यों ने और शोर शराबा शुरू कर दिया। इस पर उनकी पार्टी के सदस्यों तथा कुछ अन्य विपक्षी सदस्यों ने उपसभापति से सत्तापक्ष के सदस्यों को बिठाने और सदन में शांति कायम करने का अनुरोध किया लेकिन उप सभापति ने सत्तापक्ष के सदस्यों को शांत कराने की बजाय घंटी बजाकर तीन मिनट पूरे होने का हवाला देते हुए उन्हें ही अपनी बात समाप्त करने को कहा।
सुश्री मायावती ने कहा कि उन्होंने उप सभापति से कहा कि सहारनपुर का मामला कोई साधारण मामला नहीं है इसलिए उन्हें अपनी पूरी बात रखने दी जाए, लेकिन बार बार के अनुरोध के बावजूद भी मौका नहीं दिया गया।
इस्तीफे के पत्र में सुश्री मायावती के अनुसार उन्होंने सदन में कहा , ” भाजपा सरकारों में खुलेआम हो रहे दलितों के उत्पीडन और हत्याओं के मामलों पर मैं राज्यसभा में अंदर नहीं बोल सकती तो मेरा सदन के सदस्य के रुप में बने रहने का औचित्य नहीं है और मैं अपने पद से इस्तीफा दे दूंगी। बसपा प्रमुख ने कहा कि इसके बावजूद उप सभापति ने बोलने की अनुमति नहीं दी और इसके बाद वह सदन से बाहर चली गयी।
सुश्री मायावती ने सभापति को संबोधित करते हुए पत्र में लिखा है, ” मुझे बड़े दुख के साथ इस्तीफा देने का फैसला लेना पड़ रहा है। देश में सर्व समाज में से खासकर जिन गरीबों, दलितों, आदिवासियों, पिछडों और मुस्लिमों एवं अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों आदि के हित और कल्याण के लिए मैंने अपनी पूरी जिंदगी समर्पित की है और यदि मुझे इनके हित तथा कल्याण की भी बात सत्ता पक्ष के लोग अर्थात बीजेपी और उनके एनडीए के लोग नहीं रखने देंगे, तो फिर मुझे ऐसी स्थिति में माननीय, इस सदन में बिल्कुल भी रहने का औचित्य नहीं रहा है।ÓÓ
उन्होंने कहा कि मौजूदा स्थिति को देखते हुए उन्होंने सदन की सदस्यता से इस्तीफा देने का फैसला लिया है और इसे तुरंत स्वीकार किया जाना चाहिए। सुश्री मायावती ने अपने पत्र में वर्ष 2003 में उत्तरप्रदेश में भाजपा- बसपा की मिली जुली सरकार का भी जिक्र किया और कहा कि विचारधारा और सिद्धांतों के अंतर का कारण उस समय उन्होंने 15 महीनों के भीतर इस्तीफा दे दिया था।

 

 

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